ॐ नारी ने आज प्रत्येक क्षेत्र मे प्रगति की है! आज की नारी दोगुना उतरदायित्व निभा रही है! घर के काम के साथ-साथ ही व्यापार आदि मे भी सहयोग कर रही है ! सभी संस्थाओ के संस्थापक भले ही पुरुष रहे हो,परन्तु आज की सभी संस्थाए खड़ी नारी के कन्धो पर ही है ! नारी के अन्दर हृदय की प्रमुखता होती है,इसलिये नारी भक्ति भी सुगमता से कर सकती है ! हृदय प्रधान होने से नारी के निम्नलिखित कर्तव्य है- 1परमपिता परमात्मा की भक्ति 2शिशुओ का पालन पोषण 3पिता,भाई,पति,पुत्र आदि को निराषा,दु:ख की घड़ी मे सहानुभूति,प्रेम से धीरज देना
पुरुष मस्तिष्क प्रधान होते है, इनके कर्तव्य निम्नळिखित है- 1श्री सतगुरु से अध्यात्मिक-ज्ञान प्राप्त करना 2शारीरिक निर्वाह हेतु व्यापार करना 3माँ,बहन,पत्नि,पुत्री का संरक्षण करना पुरुषो के ये गुण अवगुणो मे तब बदल जाते है, जब पुरुष अपने बल,ज्ञान,धन आदि का अहंकार करने लगता है! इसी प्रकार से नारी अगर अपने स्नेह को केवल अपने परिवार तक सीमित रखती है,तो उसका वो स्नेह मोह रुपी अवगुण मे परिणत हो जाता है! जैसे बहता हुआ जल स्वच्छ रहता है,जबकि रुका हुआ जल गन्दला हो जाता है! ये सत्य है कि नारी बच्चे पैदा करने की मशीन नही है, परन्तु ये भी सत्य है कि नारी ही सही ढंग से बच्चो का पालन-पोषण कर सकती है! अगर उसका स्नेह अपने ही बच्चो तक सीमित न रहकर अविरल गति से सभी बच्चो तक बहता रहे तो अन्त मे उसका स्नेह रुपी जल परमात्मा रुपी समुन्द्र तक अवश्य ही पहुँच जाता है! अध्यात्मिक दृष्टि से तो नारी पुरुष मे कोई अन्तर नही है,हाँ शारीरिक और मानसिक रुप से इनमे अवश्य अन्तर है!कुछ विशेषताए नारियो मे अधिक तो कुछ पुरुषो मे अधिक पाई जाती है! नारी और पुरुष अगर मिलकर चले तो वे अवश्य ही वे पूर्णता आनन्द, शान्ति, की प्राप्ति कर सकते है! परन्तु ये मिलन शारीरिक न होकर मानसिक होना चाहिये! देखा जाता है कि विवाह होने पर जिस सुख, सन्तोष की मनुष्य अपेक्षा रखता है उसकी वो इच्छा पूर्ण नही होती! इसका कारण ये है कि वो इस मनोविज्ञान को नही जानते कि सुख शारीरिक मिलन मे नही अपितु मानसिक मिलन मे होता है! इस रहस्य को न जानकर वे एक दूसरे के शरीरो में सुख खोजतें रहते है,परन्तु सुख उपलब्ध नही होता! आप भी डूबे यजमान को भी ले डूबे वाली बात हो जाती है! भोगी अपना भी शोषण करता है,अपने सर्म्पक मे आने वालो का भी शोषण करता है! योगी अपना भी पोषण करता है और अपने सर्म्पक मे आने वालो का भी योग के बल से पोषण करता है! नारी को छूई-मूई का फूल तो नही होना चाहिये परन्तु गोभी का फूल बन मंडी मे भी नही आना चाहिये! अर्थात नारी को अपनी मानसिक, शारीरिक संरचना अनुसार ही आहार, विहार, परिधान धारण् करके अपनी मौलिकता बनाई रखनी चाहिये! भारतीय नारी की शोभा जीन्स, टोप धारण करने मे नही अपितु ळहंगा-चोली, साड़ी,सलवार-कमीज आदि जनाना परिधान धारण करने मे है, और इन वस्त्रो मे नारी अधिक आर्कषक, अधिक-सुन्दर लगती है! विपरीत चीज अधिक आर्कषित करती है, अगर नारी, पुरुष समान वस्त्र धारण करेगे तो उनमे परस्पर आर्कषण कम हो जायेगा! भले ही नारी बाहर के काम-काज, व्यवसाय आदि करे परन्तु प्रथम अपने प्रमुख कर्तव्यो को निभाये, जैसे बच्चो को अच्छे संस्कार देना, उनका उचित ढंग से पालन-पोषण इत्यादि! अगर बच्चो को सही संस्कार ना दिये तो धन देना बेकार जायेगा फिर नारी का धन कमाना किस लेखे का! किसी कवि ने बहुत सुन्दर कहा है-'पूत कपूत तो क्यों धन संचै,पूत सपूत तो क्यों धन संचै'
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