समाज में नारी की उपेक्षा
हमारे सतगुरू श्री तीसरी पादशाही जी महाराज फरमाया करते थे कि ‘स्त्री,धन’ माया नहीं, बल्कि जो तत्व आपको परमात्मा से दूर ले जाए वोहि माया है। हमारे सतगुरू जी ने तो नारियों को साधूचोला प्रदान कर उन्हें पूजा के स्थान पर स्थापित किया। आपको जानकर आर्श्चय होगा कि अपने दरबार का 85% प्रचार का कार्य नारीवर्ग ही चला रहा है। ठीक है साधनावस्था में महापुरूष एकान्तसेवन का आदेश भी देते है, जैसे कि छोटे पौधे को मेढ़ में रखा जाता है। परन्तु सोचो कि अगर पौधे को इतना ढक दिया जाए कि उसे हवा-प्रकाशादि न मिले तो पौधे का जीवन क्या सम्भव होगा। मेरा ये दावा है कि इसी प्रकार यदि नारीवर्ग और पुरूषों को अलग कर दिया जाए तो पन्द्रह दिन में पुरूषों की टें-टें बोल जाए। आजकल बाजारवाद का युग है। पुरूषों ने कभी तो चालाकी से नारी को आजादी का लालच दे, उसे बाजार में खड़ा कर मनमाने ढंग से उसका उपयोग किया और कभी वैराग्य की गलत परिभाषा गढ़ कर उसे हव्वा बना दिया,भागो- दूर भागो। भागने की नहीं जागने की आवश्यकता है। वो प्रसंग आपने सुना है ना- नदी में डूबती स्त्री को एक बोद्ध-भिक्षु अपनी कमर पे ढो लाया तो सांझ को दूसरे भिक्षु ने भगवान बुद्ध से शिकायत की- प्रभु ये भिक्षु अपनी कमर पे स्त्री को ढो लाया, इसने स्त्री स्पर्श किया है। भगवान बुद्ध ने कहा- अरे उसने तो उसके प्राण बचाने हेतु कमर पे कुछ क्षण ही ढोया और उतार दिया लेकिन तूने तो ईष्या,मत्सर विकारों को अब तक ढो रक्खा है। तू क्या स्त्री से पैदा नहीं हुआ था। आसमान से टपका या पेड़ पे उगा था। आज मेरे मानस में चिन्ता के कई विषय है उनमें प्रमुख है- समाज में नारी की उपेक्षा जिसके तहत लाखों बालिकाओं को गर्भ में ही समाप्त कर दिया जाता है। इससे बड़ा जघन्य पाप दूसरा नहीं जिसके फलस्वरूप समाज में फैल रहा है भय,आतंक,अशांति। पुत्र की इच्छा में यह पाप करते इनकी आत्मा नहीं कांपती। सरकार ने कई कानूनों का संशोधन तो किया है परन्तु जरूरत है मनोवृतियों के शोधन की। मेरी बड़ी इच्छा है इस दिशा में कार्य करने की परन्तु अपनी निर्बलता और जन सहयोग के अभाव को देखकर अभी लेख लिखकर ही सन्तोष रखने को विवश हूं।
मां भगवती सबको सदबुद्धि प्रदान करें-
या देवी सर्व भूतेषू, मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये-नमस्तस्ये-नमस्तस्ये नमो नम:।।
मां भगवती सबको सदबुद्धि प्रदान करें-
या देवी सर्व भूतेषू, मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्ये-नमस्तस्ये-नमस्तस्ये नमो नम:।।
