Saturday, May 24, 2008

समाज में नारी की उपेक्षा

हमारे सतगुरू श्री तीसरी पादशाही जी महाराज फरमाया करते थे कि ‘स्‍त्री,धन’ माया नहीं, बल्कि जो तत्‍व आपको परमात्‍मा से दूर ले जाए वोहि माया है। हमारे सतगुरू जी ने तो नारियों को साधूचोला प्रदान कर उन्‍हें पूजा के स्‍थान पर स्‍थापित किया। आपको जानकर आर्श्‍चय होगा कि अपने दरबार का 85% प्रचार का कार्य नारीवर्ग ही चला रहा है। ठीक है साधनावस्‍था में महापुरूष एकान्‍तसेवन का आदेश भी देते है, जैसे कि छोटे पौधे को मेढ़ में रखा जाता है। परन्‍तु सोचो कि अगर पौधे को इतना ढक दिया जाए कि उसे हवा-प्रकाशादि न मिले तो पौधे का जीवन क्‍या सम्‍भव होगा। मेरा ये दावा है कि इसी प्रकार यदि नारीवर्ग और पुरूषों को अलग कर दिया जाए तो पन्‍द्रह दिन में पुरूषों की टें-टें बोल जाए। आजकल बाजारवाद का युग है। पुरूषों ने कभी तो चालाकी से नारी को आजादी का लालच दे, उसे बाजार में खड़ा कर मनमाने ढंग से उसका उपयोग किया और कभी वैराग्‍य की गलत परिभाषा गढ़ कर उसे हव्‍वा बना दिया,भागो- दूर भागो। भागने की नहीं जागने की आवश्‍यकता है। वो प्रसंग आपने सुना है ना- नदी में डूबती स्‍त्री को एक बोद्ध-भिक्षु अपनी कमर पे ढो लाया तो सांझ को दूसरे भिक्षु ने भगवान बुद्ध से शिकायत की- प्रभु ये भिक्षु अपनी कमर पे स्‍त्री को ढो लाया, इसने स्‍त्री स्‍पर्श किया है। भगवान बुद्ध ने कहा- अरे उसने तो उसके प्राण बचाने हेतु कमर पे कुछ क्षण ही ढोया और उतार दिया लेकिन तूने तो ईष्‍या,मत्‍सर विकारों को अब तक ढो रक्‍खा है। तू क्‍या स्‍त्री से पैदा नहीं हुआ था। आसमान से टपका या पेड़ पे उगा था। आज मेरे मानस में चिन्‍ता के कई विषय है उनमें प्रमुख है- समाज में नारी की उपेक्षा जिसके तहत लाखों बालिकाओं को गर्भ में ही समाप्‍त कर दिया जाता है। इससे बड़ा जघन्‍य पाप दूसरा नहीं जिसके फलस्‍वरूप समाज में फैल रहा है भय,आतंक,अशांति। पुत्र की इच्‍छा में यह पाप करते इनकी आत्‍मा नहीं कांपती। सरकार ने कई कानूनों का संशोधन तो किया है परन्‍तु जरूरत है मनोवृतियों के शोधन की। मेरी बड़ी इच्‍छा है इस दिशा में कार्य करने की परन्‍तु अपनी निर्बलता और जन सहयोग के अभाव को देखकर अभी लेख लिखकर ही सन्‍तोष रखने को विवश हूं।
मां भगवती सबको सदबुद्धि प्रदान करें-
या देवी सर्व भूतेषू, मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्‍तस्‍ये-नमस्‍तस्‍ये-नमस्‍तस्‍ये नमो नम:।।

Tuesday, May 16, 2006


नारी ने आज प्रत्येक क्षेत्र मे प्रगति की है! आज की नारी दोगुना उतरदायित्व निभा रही है! घर के काम के साथ-साथ ही व्यापार आदि मे भी सहयोग कर रही है ! सभी संस्थाओ के संस्थापक भले ही पुरुष रहे हो,परन्तु आज की सभी संस्थाए खड़ी नारी के कन्धो पर ही है ! नारी के अन्दर हृदय की प्रमुखता होती है,इसलिये नारी भक्ति भी सुगमता से कर सकती है ! हृदय प्रधान होने से नारी के निम्नलिखित कर्तव्य है-
1परमपिता परमात्मा की भक्ति
2शिशुओ का पालन पोषण
3पिता,भाई,पति,पुत्र आदि को निराषा,दु:ख की घड़ी मे सहानुभूति,प्रेम से धीरज देना

पुरुष मस्तिष्क प्रधान होते है, इनके कर्तव्य निम्नळिखित है-
1श्री सतगुरु से अध्यात्मिक-ज्ञान प्राप्त करना
2शारीरिक निर्वाह हेतु व्यापार करना
3माँ,बहन,पत्नि,पुत्री का संरक्षण करना
पुरुषो के ये गुण अवगुणो मे तब बदल जाते है, जब पुरुष अपने बल,ज्ञान,धन आदि का अहंकार करने लगता है!
इसी प्रकार से नारी अगर अपने स्नेह को केवल अपने परिवार तक सीमित रखती है,तो उसका वो स्नेह मोह रुपी अवगुण मे परिणत हो जाता है! जैसे बहता हुआ जल स्वच्छ रहता है,जबकि रुका हुआ जल गन्दला हो जाता है!
ये सत्य है कि नारी बच्चे पैदा करने की मशीन नही है, परन्तु ये भी सत्य है कि नारी ही सही ढंग से बच्चो का पालन-पोषण कर सकती है! अगर उसका स्नेह अपने ही बच्चो तक सीमित न रहकर अविरल गति से सभी बच्चो तक बहता रहे तो अन्त मे उसका स्नेह रुपी जल परमात्मा रुपी समुन्द्र तक अवश्य ही पहुँच जाता है!
अध्यात्मिक दृष्टि से तो नारी पुरुष मे कोई अन्तर नही है,हाँ शारीरिक और मानसिक रुप से इनमे अवश्य अन्तर है!कुछ विशेषताए नारियो मे अधिक तो कुछ पुरुषो मे अधिक पाई जाती है! नारी और पुरुष अगर मिलकर चले तो वे अवश्य ही वे पूर्णता आनन्द, शान्ति, की प्राप्ति कर सकते है! परन्तु ये मिलन शारीरिक न होकर मानसिक होना चाहिये! देखा जाता है कि विवाह होने पर जिस सुख, सन्तोष की मनुष्य अपेक्षा रखता है उसकी वो इच्छा पूर्ण नही होती! इसका कारण ये है कि वो इस मनोविज्ञान को नही जानते कि सुख शारीरिक मिलन मे नही अपितु मानसिक मिलन मे होता है! इस रहस्य को न जानकर वे एक दूसरे के शरीरो में सुख खोजतें रहते है,परन्तु सुख उपलब्ध नही होता! आप भी डूबे यजमान को भी ले डूबे वाली बात हो जाती है!
भोगी अपना भी शोषण करता है,अपने सर्म्पक मे आने वालो का भी शोषण करता है! योगी अपना भी पोषण करता है और अपने सर्म्पक मे आने वालो का भी योग के बल से पोषण करता है!
नारी को छूई-मूई का फूल तो नही होना चाहिये परन्तु गोभी का फूल बन मंडी मे भी नही आना चाहिये! अर्थात नारी को अपनी मानसिक, शारीरिक संरचना अनुसार ही आहार, विहार, परिधान धारण् करके अपनी मौलिकता बनाई रखनी चाहिये! भारतीय नारी की शोभा जीन्स, टोप धारण करने मे नही अपितु ळहंगा-चोली, साड़ी,सलवार-कमीज आदि जनाना परिधान धारण करने मे है, और इन वस्त्रो मे नारी अधिक आर्कषक, अधिक-सुन्दर लगती है! विपरीत चीज अधिक आर्कषित करती है, अगर नारी, पुरुष समान वस्त्र धारण करेगे तो उनमे परस्पर आर्कषण कम हो जायेगा! भले ही नारी बाहर के काम-काज, व्यवसाय आदि करे परन्तु प्रथम अपने प्रमुख कर्तव्यो को निभाये, जैसे बच्चो को अच्छे संस्कार देना, उनका उचित ढंग से पालन-पोषण इत्यादि! अगर बच्चो को सही संस्कार ना दिये तो धन देना बेकार जायेगा फिर नारी का धन कमाना किस लेखे का! किसी कवि ने बहुत सुन्दर कहा है-'पूत कपूत तो क्यों धन संचै,पूत सपूत तो क्यों धन संचै'